सोमवार, 19 अक्तूबर 2009

जइसन के मालिक लिये दिये, तइसनेच देबो असीस

संगी हो देवारी तिहार के गाडा-गाडा बधई,
हमर छत्तीसगढ़ के संस्कृति के खजाना हा टप-टप ले भरे हवय, कभू -कभू अईसन लागथे के जम्मो दुनिया ले अमीर हमी मन हन. हमर तिहार हमर संस्कारे मन हमला अमीर बनाथे, हमर संस्कार अऊ संस्कृति के बचाए के जिमेदारी हमरे हवय.इही म एक ठक रतन हवय हमर राऊत नाचा. हमर राउत नाचा के अलगे पहिचान हे, हमर यदुवंसी भाई मन के परमपरा से चले आवत ये दे नाचा हा, हमर जीवन मा एक नवा जोश अऊ सक्ती भरथे, जम्मो राउत भाई मन साज सिंगार करके बने रंग-रंग के बाना पहिर के जब जोहारे ला निकलथे ता ओखर छटा हा निराला होथे, अऊ जब नाच हा चलते अऊ बाजा हा बाजथे ता संगी हो गोड हा नई रुकय, अपने अपन नाचे ला धर लेथे, एक रस के हा सरीर मा समां जथे अऊ मन मयूर हा नाचे ला धर लेथे.जौन ढंग ले परान बिन सरीर, पुरुस बिन नारी, उजियार बिन अंधियार, तईसने गड़वा बाजा बिन राउत नाचा बिन परन के हवय.जब गड़वा बाजा संग राउत भाई मन सलूखा, धोती, बासकिट, कौडी के जेवर, मूड मा पगड़ी, पांव मा घुंघरू, कमर मा चाँदी के करधन, हाथ मा तेंदू के दू-दू ठक लऊड़ी अऊ बने पहिर ओढ़ के नाचे-जोहारे बर निकलथे ता अईसन लागथे के किसन भगवान के सेना हा महाभारत के लड़ई जीते के खुसी मा नगर अगवानी मा  नाचत-गावत हे, एक दम जोश हा मन मा भर जथे. जब दोहा पारथे ता लागथे जईसन विजय के उदघोस करत हवय,
जइसन के मालिक लिये दिये, तइसनेच देबो असीस
रंग महल मा बईठो मालिक जियो लाख बरीस,
अईसन असीस हा सुन के जम्मो चोला हा गद-गद हो जथे.हमर सस्कृति ला बचाए के श्रेय राउत भाई मन ला जथे. जम्मो भाई मन ला देवारी तिहार के पर्रा-पर्रा, गाडा-गाडा भर बधई,
जोहार लेहु गा संगी हो.

आप मन के  

गंवईहा संगवारी
ललित शर्मा
अभनपुरिहा 

2 Comments:

जी.के. अवधिया said...

बने बात गोठियाये हस संगी! फेर थोकुन गड़बड़ असन लागत हे मोला, "जईसन तोर लीयेन-दियेन वईसे देबो असीस," के जघा कहूँ "जइसन के मालिक लिये दिये, तइसनेच देबो असीस" तो नई हे?

फेर अइसे मत समझ लेबे के तोर गलती निकालत हौं मैंहा, मैं जइसन जानत रेहेंव वइसनेच ला बता दियेव भाई।

ललित शर्मा said...

ये दे अईसनेच बर सियान मन के असीस हा लागथे, तेखरे सेती सुरहु्ती मा पैलगी करके आये रेहेवं,सुधारे ला लागही काबर के "अड़हा तांव" गलती हो जथे, बने आवत रहु,आपके अगोरा रिही,

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