शनिवार, 5 दिसंबर 2009

रिकिम रिकिम के साहित सेवा अऊ, भोभला बर चना चबेना

संगी हो जय जोहार,


मैं हाँ दू चार दिन पहिले ये बुलाग के सेवा ले हवं. एखर ले पहिले में हाँ नई जानत रहेवं काला बलाग कथे, जानेवं ता महूँ हाँ अपन गोठियाये के खजरी ला मेटाए बर ये दे बूता ला कर डारेवं, मोर डिमाग ले बुलाग के बूता हाँ बुलाग कम, बुलक दे जियादा हवये, हमन हांना कथन ना "मार के टरक दे अऊ खाके सूत जा" तईसने बूता बुलाग के हवे. अपन गोठ ला गोठिया ले तहां काखरो झन सुन. ओ कोती मूड ला पटकन दे. अऊ एक ठन नवा जिनिस देखेवं, इंहा रिकिम-रिकिम के साहितकार हवय, कई झन ता अलकरहा घलोक हे, रात दिन जागते अऊ लिखत रहिथे पढ़त रहिथे, मोला ता लागथे रात के घुघवा हाँ घलोक सूत जात होही पर ये मन नई सुतय, एखर मन के किस्‍सा कहिनी हा रात भर चालू रहिथे, मोर डिमाग हा नई पुरय. रंग-रंग के नावं हवय, कुकुर बिलाई मन के नावं हा घला नई बांचे हे उहू ला धर डारे हवय, में हा इंहा आके अडबड गियान पायेवं.


साहितकार ओला कथय जेन सब के हित ला सोचय, जम्मो समाज के हित के चिंता करे, साहितकार मन के गोठ हा दिन रात चलत रहिथे, कहिथे ना "बईला ला बांध दे घाट मा, अऊ..........ला फांद दे बात मा." अइसनेच बूता हवय जान लुहू गा. हमर गाँव मा घलो एक झन साहितकार हवय, में हा घर ले निकलेवं ता ओला भेंट पायेवं राम-राम जोहार होईस ता पुछेवं कहाँ जात हस गा बिहनिया-बिहनिया झोला धर के, ता वो हा किहिस - का बताववं गा एक ठक गीत लिखहूँ सोचत हंव त घर मा लईका मन उतलईंन करत हे, हांव-हांव के मारे सबे मामला हा गड़बड़ हो जथे, त बांधा पार में बइठ के लिखहूँ, उन्हचे बने  विचार मन उमड़ थे, मै कहेवं बने साहित के सेवा करत हस गा अइसने होना चाही.


एक दिन टिरेन मा बिलासपुर ले आवत रहेंव त मोर सीट के पाछू मा एक झन मनखे हा जोर लगा लगा के कंही पढ़त रिहीस, दू चार ठन टूरा मन जुरियाये रिहिसे, गोठ ला सुन के महूँ हा लहुट परेवं, देखेंव त उहू साहितकार रिहीस ,याहा रोठ के डायरी ला धरे रहय अऊ कविता पढ़त रहय, इहु एक ठक साहित सेवा हवे, में हा पुछेवं, का बाबा टिरेन मा घला कबी समेलन चलत हे, ता वो हा किहिस-काखर अगोरा करबे के तोला कबी समेलन म बलाही अऊ परघा के तोर आनी-बानी के गीत अऊ कविता ला सुनही, ये बेरा मा सरोता मन घलोक हुसियार हो गे हवय, तैं कविता पढ़े ला चालु करबे तो बैईठ  बैईठ कहिके नरीयाथे, तेखर  इही बने १० रूपया के टिकिस कटा लोकल मा, अऊ अपन कविता के पाठ ला चलन दे ,सरोता घलो मिल जाते अऊ कोनो बोरियाथे,  ते हा आघू  टेसन मा उतर घला जथे, मोला अऊ नवा सरोता मिल जथे, सबले बढ़िया मोला इही मंच हा लागथे, मैं  कहेंव धन्य हस बबा तेहां अतक बड बलिदान साहित बर देवत हस.


हमर तिवारी गुरूजी हवय तहां लकठा के इस्कूल में पढाये बर जाथे, ओखर इस्कूल के पाछू मा एक ठक कुंवा हवय, कुंवा हा सुक्खा हवय, कोई १५ हाथ के होही, खाए के छुट्टी के बेरा मा एक बिदयार्थी हा कुंवा मा गिर गे, इस्कूल के छुट्टी होय के बेरा मा गुरूजी हा देखिस एक झन टूरा के बसता हा माढे हवय, अऊ टूरा हा गायब हे, ओला खोजिस, नई पाईस त कुंवा डहार ला देख लौं कहिके गिस, गुरूजी कुंवा मा झांकिस त टूरा हाँ कुंवा मा रिहीस,टूरा हाँ कुंवा में रिहीस अऊ गोटी पथरा ला बल भर उपर डाहर फेंकय, अब ओला हेरे के संसो पर गे गुरूजी हा, सोंचिस लुवाई के टैम चलत हे जम्मो  झन खेत खार मा जाये रहिथे कोन ला बलावं? तभे सुरता आइस गावं में एक झन "बिमरहा" नावं के कवी साहितकार रहिथे, वो हा सिरतोन मा बिमरहा नई ये, कवि बनिस त नावं खोजिस, कोनो नावं नई मिलिस, काबर के सबो नावं ला अऊ कवी मन पोगरा डारे हे त मेहा इही बिमरहा नावं ला धर डरत हवं, अइसे करके ओखर नावं हा बिमरहा परगे, ठेलहा उही मिलही, चल उही ला बलावं, टूरा ला कुंवा ले हेरे मा मदद करही, कहिके गुरूजी ओखरे मेर चल दिस, बिमरहा देखिस गुरूजी आये हवय कहिके खुस होगे, गुरूजी हा अपन पीरा ला बताइस, त बिमरहा कहिथे ये दे गुरूजी बने होगे ते आगेस त अभीच्चे एक ठन नवा गीत लिखे हवंव, थोकिन सुन ले फेर टूरा ला कुंवा ले हेर देबो, अभी वो हा बने सुरकसित जगा में हवय, कांही संसो के बात नईये, जब गुरूजी ओखर खोली मा खुसरिस त देखिस पांच पन्ना के गीत, गुरूजी के ......................गे, अब नई बांचवं दादा कहिके, गीत ला सुनिस अऊ टूरा ला कुंवा ले हेरिस, अइसने घला साहित सेवा होथे.
अब बिसराम दव संगी हो,

जम्मो ला मोर राम-राम जोहार .
आपके गंवईहा संगवारी

ललित शर्मा

8 Comments:

पी.सी.गोदियाल said...

अरे ताऊ कहाँ हो ? मैं आपको उधर ताऊ की महफिल में मिस कर रहा हूँ और आप है की ... इसको बाद में पढूंगा !

खुशदीप सहगल said...

ललित भाई,
तनिक ये तो बता देईते, ये कौन सी भाषा का दयार है...

जय हिंद...

Udan Tashtari said...

इतनी टंकार छत्तीसगढ़ी तो समझ ही नहीं आ पा रही...ललित भी..फिर भी हिज्जे जोड़ जोड़ कर फिर से पढ़ेंगे...कुंआ में बच्चा गिरा है उसका क्या हुआ जानने के लिए. :)

ललित शर्मा said...

@खुशदीप भाई-ये हमारी मातृ भाषा छत्तिसगढी, और इस पोस्ट मे ब्लाग और साहित्यकारों के उपर व्यंग्य है।

ललित शर्मा said...

@ समीर भाई-सारांस यह है कि" स्कुल का बच्चा कुंआ मे गिरने के बाद उसे निकालने वाल कोई नही मिल तो गुरुजी गांव मे एक निठल्ले साहित्यकार "बिमरहा" के पास गये तो वो बोला "बढिया किये गुरुजी आप आ गये, अभी मै एक नयी कविता लि्खा हुँ उसे सुन लिजिए,लड़का तो अभी सुरक्षित जगह मे है। उसे तो बाद मे निकाल लेंगे, गुरुजी अब फ़ंस गये थे, उनहोने दे्खा की पाँच पेज की की कविता थी, देख के गुरुजी की......गई, कविता सुना के कवि महोदय उसको कुंए से निकालने गये। ऐसी भी साहित्य सेवा होती है।

विनोद कुमार पांडेय said...

ललित जी आपने किस भाष का प्रयोग किया है पता नही इसे हिन्दी मे भी प्रस्तुत करे तो कुछ ज़्यादा समझ मे आए..

Neeraj janu said...

छत्तिसगढीया सबले बढीया कथेँ ते ह सही बात आय ईखर मन सन रेहे अऊ उखर बिचार ल जाने के बड मन करथे।

Neeraj Kuldeep said...

छत्तिसगढ कि जय

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